मुखपृष्ठ / पद्मशाली इतिहास

प्राचीन निवास-क्षेत्र और प्रवास

पद्मशाली कहाँ से कहाँ गए? कौन-से अभिलेख हैं, और किन दावों के लिए अभी ठोस प्रमाण चाहिए — इसे ईमानदारी से अलग-अलग दिखाने वाला अध्याय।

अध्याय (15)
  1. पद्मशाली कौन हैं?
  2. भावना ऋषि और पद्मशाली परंपरा
  3. उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक परंपरा
  4. कमल, पद्म और बुनाई परंपरा
  5. प्राचीन निवास-क्षेत्र और प्रवास
  6. आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु
  7. बुनाई उद्योग और सामाजिक योगदान
  8. राजवंशों के काल में पद्मशाली
  9. मंदिर, धर्म और संस्कृति
  10. सामाजिक संरचना, गोत्र, शाखाएँ
  11. शाप से जुड़ी परंपरा — अलग खंड
  12. औपनिवेशिक काल और दस्तावेज़
  13. आधुनिक काल के पद्मशाली
  14. विश्व भर में समुदाय का फैलाव
  15. उपसंहार
अध्याय 5

प्राचीन निवास-क्षेत्र और प्रवास

पद्मशालियों से जुड़े अभिलेख अधिकतर तेलुगु क्षेत्रों को ही आरंभ-स्थान बताते हैं। वहाँ से बुनकर परिवार तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल जैसे कई क्षेत्रों में फैले। परंतु किस काल में और किस मार्ग से — इस पर प्रमाण एक समान नहीं हैं। यह अध्याय उस अंतर को छिपाए बिना दिखाता है।

  • जीवित सामुदायिक परंपरा
  • लिखित प्रमाण
  • जिसकी पुष्टि बाकी है

जो स्पष्ट रूप से दर्ज है

वे दावे जिनके लिए ठोस प्रमाण चाहिए

नाम किस तरह साथ चले

प्रवास करने वाले बुनकरों ने नए स्थानों पर अपने नाम भी बदले, या नए नाम पाए।

  • आंध्र: पद्मशाली, साले।
  • तमिलनाडु: सालियर, पद्मसालियर (तमिल और तेलुगु दोनों बोलने वाले)।
  • कर्नाटक: सालिगा, सालिया।
  • केरल: चालियन या शालियर। कुछ अभिलेख कहते हैं कि केरल में कई लोग आज स्वयं को “पद्मशालियर” कहते हैं और यह नाम तेलुगु क्षेत्र के पद्मशालियों से लिया गया है।

जीवित परंपरा — परिवारों की स्मृति

एक नज़र में

दावास्थिति
आंध्र क्षेत्रों से तमिल-भाषी क्षेत्रों में बसावटअभिलेख हैं
कांचीपुरम में “सालियर गली”अभिलेख है; मूल ग्रंथ दिखाना बाकी है
विजयनगर काल में बुनकरों का प्रवाससामान्य शोध; पद्मशालियों के लिए अलग से जाँचना है
सातवाहन मूलजिसकी पुष्टि बाकी है
10वीं शताब्दी में चोल काल में आगमनजिसकी पुष्टि बाकी है
परिवारों की प्रवास-स्मृतियाँजीवित परंपरा

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6. आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु — फैलाव — क्षेत्र-वार आज का फैलाव, भाषा और सांस्कृतिक भिन्नताएँ।