बुनाई पद्मशाली पहचान का केंद्र है। परंतु दक्षिण भारत का बुनाई इतिहास कई समुदायों ने मिलकर बनाया है। इसलिए यहाँ हम पद्मशालियों की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताते; अन्य बुनकर समुदायों का सम्मान करते हुए केवल वही दिखाते हैं जो अभिलेख कहते हैं।
पुराण
जीवित सामुदायिक परंपरा
लिखित प्रमाण
जिसकी पुष्टि / संग्रह बाकी है
बुनाई — व्यवसाय भी, परंपरा भी
हथकरघा बुनाई एक पारिवारिक व्यवसाय है। कौशल पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है: धागा तैयार करना, रँगना, करघा लगाना, नमूना बुनना। इसी कारण बुनकरों की बस्तियाँ अलग गलियों और अलग सामुदायिक जीवन के रूप में बसीं।
कांचीपुरम और रेशम की बुनाई
शिलालेखीय प्रमाण — सालियर कर
मंदिरों के लिए वस्त्र
व्यापार
आज की चुनौतियाँ
सामाजिक योगदान
बुनाई के अलावा शिक्षा, सामुदायिक संघ, मंदिर न्यास, चिकित्सा, राजनीति और कला के क्षेत्रों में भी इस समुदाय के लोगों का योगदान है।
एक नज़र में
बात
वर्ग
बुनाई दैवी कार्य; भावना ऋषि की कथा
कुलपुराण
कांचीपुरम में देवांग, पट्टुसालियर का बसना (15वीं–16वीं शताब्दी)
लिखित प्रमाण
10वीं शताब्दी में कांचीपुरम में “सालियर” और सालियर कर
शिलालेखीय प्रमाण (मूल स्रोत की पुष्टि बाकी है)
रेशम बेचने वाले बड़े प्रतिष्ठान पद्मशाली परिवारों के हैं
जीवित परंपरा / व्यापार
शिक्षा, संघ, सार्वजनिक सेवा
जो एकत्र करना बाकी है
अगला अध्याय
8. राजवंशों के काल में पद्मशाली — शिलालेख, राजकीय संरक्षण, बुनकरों के अधिकार और करों से जुड़े अभिलेख।
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